श्रीपुर के पाण्डुवंश अथवा सोमवंश
शरभपुरीय वंश की समाप्ति के बाद पाण्डुवंशियों ने दक्षिण कोसल में अपने वर्चस्व की स्थापना की. उन्होंने सिरपुर को अपनी राजधानी बनाया. ये अपने को सोमवंशी पाण्डव कहते थे. अभिलेखों में उन्हें पाण्डुवंश का भी कहा गया है. वस्तुतः सोनपुर-बलांगीर क्षेत्र में राज्य करने वाले परवर्ती सोमवंशियों से भिन्नता प्रकट करने के लिये इनका उल्लेख पाण्डुवंश के रूप में किया जाता है. साथ ही मैकल में इस राजवंश को पाण्डुवंश तथा दक्षिण कोसल में इन्हें सोमवंशी कहा गया है. कालंजर के एक शिलालेख में इस वंश के आदिपुरुष का नाम उदयन मिलता है. इसका पुत्र इंद्रबल था, जो शरभपुरीय शासक सुदेवराज का सामन्त था. इसी ने शरभपुरियों को सत्ताच्युत कर पाण्डुवंश की स्थापना की थी.

नन्नराज प्रथम
इन्द्रबल के चार पुत्र थे, इसमें सबसे बड़ा पुत्र नन्नराज प्रथम था. यही इन्द्रबल का उत्तराधिकारी हुआ. इसी काल में पाण्डुवंश का राज्य विस्तार एक बड़े भू भाग में हो चुका था. इसने अपने शेष तीनों भाइयों को मण्डलाधिपति के रूप में स्थापित किया. दूसरे पुत्र का नाम सुरबल था. तीसरे पुत्र इशानदेव का उल्लेख खरोद के लक्ष्मणेश्वर मन्दिर के शिलालेख में हुआ है. चौथे पुत्र भवदेव ‘रणकेशरी’ के विषय में जानकारी उसके भांदक शिलालेख से प्राप्त होता है.
महाशिव तीबरदेव
नन्नराज के पुत्र एवं उत्तराधिकारी महाशिव तीवरदेव इस वंश का प्रतापी राजा था. इसका काल पाण्डुवंशी सत्ता का उत्कर्ष काल कहा जा सकता है, इसने कोसल, उत्कल और अन्य राज्यों तक अपने राज्य का विस्तार कर ‘सकल कोसलाधिपति’ की उपाधि धारण की. इसके तीन ताम्रपत्र प्राप्त हुये हैं. राजिम और बालोद में प्राप्त ताम्रपत्र इसके पराक्रम का संकेत देते हैं.
नन्नदेव अथवा नन्न द्वितीय
तीवरदेव का उत्तराधिकारी उसका पुत्र नन्नदेव हुआ. इसका एकमात्र ताम्रपत्र अड़भार से प्राप्त हुआ है. इसमें इसे कोसल मण्डलाधिपति कहा गया है. इसके शासन की कोई अन्य जानकारी नहीं मिलती. इसकी राज्यावधि अल्प थी.
चन्द्रगुप्त
सम्भवतः नन्नदेव संतानविहीन था. अतः उसकी मृत्यु पर उसका चाचा अर्थात् तीवरदेव का अनुज चन्द्रगुप्त सोमसत्ता का उत्तराधिकारी हुआ. सिरपुर के लक्ष्मण मन्दिर स्थित शिलालेख में राजा चन्द्रगुप्त का उल्लेख किया गया है,
हर्षगुप्त-
सिरपुर लेख के अनुसार चन्द्रगुप्त का पुत्र एवं उत्तराधिकारी हर्षगुप्त हुआ, जिसका विवाह मगध के मौखरी राजा सूर्यवर्मा की पुत्री वासटादेवी से हुआ था. इसके दो पुत्र महाशिवगुप्त एवं रणकेशरी थे. हर्ष की मृत्यु के पश्चात् उसकी रानी वासटा ने उसकी स्मृति में सिरपुर में हरि (विष्णु) का एक भव्य मन्दिर बनवाया. ईंटों से निर्मित यह मन्दिर आज लक्ष्मण मन्दिर के नाम से विद्यमान है, जो इस क्षेत्र में उत्तर गुप्त वास्तुकला का श्रेष्ठ उदाहरण है. यह भारतीय शिल्प का अद्वितीय उदाहरण है.
महाशिवगुप्त-बालार्जुन
हर्षगुप्त के पश्चात् उसका पुत्र महाशिवगुप्त राजा हुआ. वाल्यावस्था में वह धनुर्विद्या में पारंगत हो गया था. अतः यह वालार्जुन भी कहलाता है, इसने दीर्घकाल, लगभग 60 वर्षों तक शासन किया, विद्वानों ने इसकी राज्यावधि 595-655 ई. निर्धारित की है. इसके राजत्व काल के 57वें वर्ष के तीन अभिलेख प्राप्त हुये हैं. यह शैव धर्मावलंबी होने के बाद भी अन्यों के प्रति उदार एवं सहिष्णु था. इसके समय राजधानी श्रीपुर एवं अन्य स्थलों में शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन धर्मों से सम्बन्धित अनेक स्मारकों एवं कृतियों का निर्माण हुआ, इस काल की धातु प्रतिमायें कला की दृष्टि से अद्वितीय कही जा सकती हैं.
श्रीपुर इस काल में बौद्ध धर्म के महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में प्रख्यात था. यह बात कन्नौज के हर्ष के दरबार में आये चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रावृत्तांत से प्रकट होती है. ह्वेनसांग महाशिवगुप्त के काल में ही लगभग 635-640 ई. के मध्य (सम्भवतः 639 ई. में) श्रीपुर अपने दक्षिण भारत यात्रा के दौरान पहुँचा था. ह्वेनसांग ने अनेक बौद्ध विहार, स्तूप एवं बुद्ध की विशाल मूर्तियों का उल्लेख किया है, जिसकी पुष्टि पुरातात्विक अवशेषों से होती है.
ह्वेनसांग ने इस क्षेत्र को ‘किया- स-लो’ के नाम से उल्लिखित किया है, किन्तु यहाँ की राजधानी का नामोल्लेख नहीं किया. उसका कहना है यहाँ राजा क्षत्रिय है तथा बौद्ध धर्म में श्रद्धा रखता है. उसने लिखा है राज्य में सौ संघाराम (बिहार) थे, जहाँ दस हजार महायानी बौद्ध भिक्षु निवास करते थे एवं सत्तर देव मन्दिर भी थे. ह्वेनसांग द्वारा वर्णित अशोक द्वारा निर्मित स्तूप का पता नहीं चल सका है.
महाशिवगुप्त कन्नौज के हर्ष का समकालीन था. इसके शासन काल में श्रीपुर की बहुत उन्नति हुई. इसके शासनकाल को दक्षिण कोसल अथवा छत्तीसगढ़ के इतिहास का स्वर्ण काल कहा जाता है.
वातापि नरेश पुलकेशिन द्वितीय के एहोल प्रशस्ति के अनुसार ईस्वी 634 में कोसल नरेश उसके द्वारा पराजित किया गया था और सम्भवतः उसने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी. स्पष्टतः रेवा के निकट सकलोत्तरपथनाथ हर्ष को पराजित करने के पूर्व वह दक्षिण कोसल से गुजरा था और इस समय बालार्जुन ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली हो, अतः इसके काल में दक्षिण कोसल दक्षिणी राजवंशों के प्रभाव में आ चुका था.
महाशिवगुप्त बालार्जुन के 27 ताम्रपत्र सिरपुर में एक व्यक्ति के बाड़ी में खुदाई के दौरान प्राप्त हुये थे, जिसका सर्वप्रथम अध्ययन डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर एवं डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र ने किया था.
बालार्जुन के बाद के शासक महत्वपूर्ण सिद्ध नहीं हुये. इसके बाद इस वंश का पतन आरम्भ हो गया. सम्भवतः पाण्डुवंशियों के पतन में नलवंशी विलासतुंग (700-740 ई.) तथा बाणवंशी विक्रमादित्य (870-895 ई.) की भूमिकायें थीं. सोमवंशी राजाओं की सभा में अत्यन्त सुशिक्षित और धुरंधर पंडित रहते थे, उनकी शासन प्रणाली भी तत्कालीन समय में उत्कृष्ट थी.
नल, बाण और कलचुरियों द्वारा छत्तीसगढ़ क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के कारण श्रीपुर के पाण्डुवंशीय शासकों को पूर्व की ओर जाना पड़ा तथा उन्होंने ओडिशा के सोनपुर क्षेत्र में सोमवंश के नाम से राज्य स्थापित किया. इस वंश का सर्वप्रथम राजा शिवगुप्त हुआ. चूँकि यह क्षेत्र वर्तमान में छत्तीसगढ़ की सीमा से बाहर है. अतः यहाँ इस पर चर्चा नहीं की जा रही है.
छत्तीसगढ़ में पाण्डुवंश
पाण्डुवंशियों ने शरभपुरीय राजवंश को पराजित करने के बाद श्रीपुर को अपनी राजधानी बनाया। ईस्वी सन छठी सदी में दक्षिण कौसल के बहुत बड़े क्षेत्र में इन पाण्डुवंशियों का शासन था।इस वंश का शासन 6 ई से 7 वी ई तक रहा।
प्रसिद्ध शासक
उदयन :-
आदिपुरुष कहा जाता है । संस्थापक, इनके शासन काल का उल्लेख नहीं है। राजधानी :- श्रीपुर (सिरपुर)
इन्द्रबल :–
पाण्डुवंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। मांदक में जो अभिलेख प्राप्त हुआ है, उसमें इन्द्रबल के चार पुत्रों का उल्लेख किया गया है। इंद्रबल के बारे में जानकारी उनके बेटे और उत्तराधिकारी इसनदेव का एक शिलालेख से मिलती है। इंद्रबल शरभपुरीय शासक सुदेवराज का सामन्त था। सुदेवराज मृत्यु के बाद प्रवरराज प्रथम शासन काल में पाण्डु वंशी इंद्रबल ने अवसर पाकर उत्तर-पूर्वी भाग में अधिकार कर शरभपुरीय शासन को समाप्त कर पाण्डु वंश की स्थापना की और श्रीपुर को राजधानी बनाया ।
नन् राज प्रथम :-
इन्द्रबल का एक बेटा था नन्न। राजा नन्न बहुत ही वीर व पराक्रमी था। राजा नन्न ने अपने राज्य का खूब विस्तार किया था। राजा नन्न का छोटा भाई था ईशान-देव। उनके शासनकाल में पाण्डुवंशियों का राज्य दक्षिण कौसल के बहुत ही बड़े क्षेत्र पर फैल चुका था। खरोद जो बिलासपुर जिले में स्थित है, वहां एक शिलालेख मिला है जिसमें ईशान-देव का उल्लेख किया गया है।
महाशिव तीवरदेव:
उपाधी-सकलकोशलाधिपति पाण्डुवंश का उत्कर्ष कल राजा नन्न का पुत्र महाशिव तीवरदेव ने वीर होने के कारण इस वंश की स्थिति को और भी मजबूत किया था। महाशिव तीवरदेव को कौसलाधिपति की उपाधि मिली थी क्योंकि उन्होंने कौसल, उत्कल व दूसरे और भी कई मण्डलों पर अपना अधिकार स्थापित किया था। राजिम और बलौदा में कुछ ताम्रपत्र मिले हैं जिससे पता चलता है कि महाशिव तीवरदेव कितने पराक्रमी थे।
ननदेव द्वितीय :-
उपाधि-कोशलमंडलाधिपति ताम्रपत्र – अंढ़भार (जांजगीर) से प्राप्त हुआ। महाशिव तीवरदेव का बेटा महान्न उनके बाद राजा हुआ। वे बहुत ही कम समय के लिये राजा बने थे। उनकी कोई सन्तान न होने के कारण उनके चाचा चन्द्रगुप्त कौसल के नरेश बने।
चंद्रगुप्त का पुत्र हर्षगुप्त :-
हर्षगुप्त:- हर्षगुप्त का विवाह मगध के मौखरी राजा सूर्यवर्मा की पुत्री से हुआ।राजा हर्षगुप्त की पत्नी का नाम वासटा था।हर्षगुप्त की मृत्यु के बाद महारानी वासटा ने पति की स्मृति (600 ई.) में लक्ष्मण मन्दिर का निर्माण करवाया था जो एक विष्णु मंदिर है । यह मन्दिर बहुत ही सुन्दर है। उस काल की वास्तु कला का श्रेष्ठ उदाहरण है।
महाशिवगुप्त (595-655 ई.) :-
हर्षगुप्त के पुत्र । ये शैव धर्म के अनुयायी थे। वे बहुत ही वीर थे। वे और एक नाम से जाने जाते थे :- बालार्जुन। उन्हें बालार्जुन इस लिए कहा जाता था क्योंकि वे धनुर्विद्या में निपुण थे। ऐसा कहते हैं कि वे धनुर्विद्या में अर्जुन जैसे थे। उन्होंने लगभग 60 वर्ष शासन किया । इनकी राजधानी- सिरपुर इसका शासन काल छत्तीसगढ़ इतिहास का स्वर्ण काल कहा जाता है ह्वेनसांग 639 ईसा को छत्तीसगढ़ की यात्रा की और अपनी रचना सी-यु-की में छत्तीसगढ़ को किया-सलो नाम से वर्णन मिलता है। सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर का निमार्ण कार्य पूरा किया। महाशिवगुप्त बालार्जुन ,हर्षवर्धन ,पुलकेशिन-2 तथा नरसिंहवर्मन का समकालिक था। महाशिवगुप्त के 27 ताम्रपत्र सिरपुर से मिले हैं ।
