600 साल से अधिक पुरानी परंपरा बस्तर दशहरा की ‘कुटुंब जात्रा’ रस्म विधि-विधान से संपन्न हुई। इस अवसर पर देवी-देवताओं के छत्र और डोली को राजपरिवार के सदस्य श्री कमलचंद भंजदेव ने ससम्मान विदा किया।

🌺 बस्तर दशहरा की एक अनूठी रस्म – ‘कुटुंब जात्रा’
अपनी अनूठी परंपराओं और धार्मिक रस्मों के लिए विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व की एक और महत्वपूर्ण रस्म ‘कुटुंब जात्रा’ रविवार को जगदलपुर के महात्मा गांधी स्कूल परिसर स्थित गुड़ी में संपन्न हुई।
इस रस्म में बस्तर संभाग के सभी क्षेत्रों के साथ-साथ ओडिशा और महाराष्ट्र के समीपवर्ती गांवों से आए हजारों देवी-देवताओं के छत्र और डोली ने भाग लिया।
राजपरिवार के सदस्य श्री कमलचंद भंजदेव ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर देवी-देवताओं को ससम्मान विदा किया। यह रस्म 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा पर्व की समाप्ति की ओर संकेत करती है।
🕉️ 600 साल से अधिक पुरानी परंपरा का निर्वाह
बस्तर दशहरा की सबसे खास बात यह है कि केवल इसी पर्व में इतनी बड़ी संख्या में गांव-गांव के देवी-देवताओं की उपस्थिति होती है।
यह परंपरा रियासत काल से चली आ रही है और आज भी पूरे श्रद्धा और गौरव के साथ निभाई जाती है।
राजपरिवार और दशहरा समिति के सदस्य परंपरा अनुसार प्रत्येक देवी-देवता और उनके पुजारियों को श्रद्धा, भेंट और दक्षिणा देकर विदा करते हैं।
🙏 ‘रूसूम’ देकर की गई ससम्मान विदाई
इस वर्ष भी परंपरा अनुसार, दशहरा पर्व में शामिल होने आए सभी देवी-देवताओं को ‘रूसूम’ (दक्षिणा/भेंट) दी गई।
राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव और दशहरा समिति ने पुजारियों को कपड़े, धन और मिठाइयां भेंट स्वरूप दीं।
🏵️ श्रद्धालुओं की भीड़ और धार्मिक उल्लास का वातावरण
शहर के गंगामुण्डा वार्ड स्थित देवगुड़ी में श्रद्धालुओं ने अपनी मनोकामना अनुसार देवी-देवताओं को भेंट अर्पित की।
सिरहा और आंगादेवों के पारंपरिक नृत्य, ढोल-नगाड़े, और डोली की झूमती लय से पूरा वातावरण भक्ति और उत्साह से गूंज उठा।
🌿 बस्तर की संस्कृति का जीवंत प्रतीक
‘कुटुंब जात्रा’ रस्म के साथ ही बस्तर दशहरा की 600 साल पुरानी परंपरा का विधिवत समापन हुआ।
यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि आदिवासी संस्कृति, लोकपरंपरा और सामाजिक एकता का जीवंत उदाहरण भी है।
📜 निष्कर्ष
बस्तर दशहरा कुटुंब जात्रा बस्तर की धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और परंपरागत विरासत का उत्सव है।
इस रस्म से यह संदेश मिलता है कि जब तक समाज अपनी परंपराओं से जुड़ा रहेगा, उसकी सांस्कृतिक पहचान सदैव जीवित रहेगी।
