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सेवा का तीर्थस्थली भारतीय कुष्ठ निवारक संघ चांपा

“जहाँ के सेवाव्रती बापट जी को मिला था पद्मश्री सम्मान”

पद्मश्री बापट जी

करुणाकर उपाध्याय

चिकित्सालय,स्कूल,गौशाला,छात्रावास खेत खलिहान,सुदंर बगीचे,तालाब लघु एवं कुटीर उद्योग केन्द्र सिलाई बुनाई केन्द्र मंदिर डाकघर आदि से सुसज्जित कात्रे नगर अर्थात भारतीय कुष्ठ निवारक संघ चांपा जिसे आम तौर पर सोंठी आश्रम के नाम से जाना जाता है । इसे देखकर सहसा किसी को विश्वास नहीं होगा कि एक दिव्यांग तथा कुष्ठ रोग से ग्रसित व्यक्ति ने वह भी जीवन के पचास वर्ष में पहुंचने के बाद इसकी स्थापना की है।

“जीवन का पासा फेंक दो चाहे जैसा गिरे समर्पण की भावना का भगवाध्वज आव्हान करता है”

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के द्वितीय सर संघ चालक स्व श्री माधव राव सदाशिव गोलवलकर “गुरुजी” के उक्त वचन को अपने जीवन का सुत्र मानकर शून्य से एक सृष्टि की रचना का जीवन दर्शन ( भारतीय कुष्ठ निवारक संघ सोंठी की स्थापना ) कराने वाले महान कर्मयोगी का नाम है सदाशिव गोविंद कात्रे जी। चांपा के स्वतंत्र पत्रकार अनंत थवाईत बताते हैं कि 1960 में श्री गोविंद कात्रे जी चांपा आए थे और दो वर्ष के अथक परिश्रम के बाद उन्होंने 1962 में चांपा से लगभग आठ किलोमीटर दूर सोंठी ग्राम में भारतीय कुष्ठ निवारक संघ की स्थापना की। कुष्ठ रोग से ग्रसित एक स्वयं सेवक द्वारा स्थापित यह भारतीय कुष्ठ निवारक संघ विश्व की पहली संस्था है जो एक कुष्ठ रोगी द्वारा स्थापित की गई है।

"अछूत लोग भी कुष्ठ रोगी को हीन समझते हैं। यह मेरा विश्वास है कि घृणा पात्र कुष्ठ रोगियों के सानिध्य मे ईश्वर का अस्तित्व होता है। ईश्वर का साक्षात्कार कुष्ठ आश्रम मे ही होना संभव है" यह बात महात्मा गांधी जी ने अपने छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान एक कुष्ठ आश्रम को देखकर कही थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के इन विचारों को पूरी तरह सार्थक कर रहा है भारतीय कुष्ठ निवारक संघ सोंठी आश्रम। जिसे आज लोग कात्रे नगर के नाम से भी जानने लगे हैं।

चांपा निवासी स्वतंत्र पत्रकार श्री अनंत थवाईत बताते हैं कि इस आश्रम मे राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के तत्कालीन सह कार्यवाहक वर्तमान में प. पू .सर संघ चालक माननीय मोहन भागवत जी का सन 2006 में दीपावली के पुण्य अवसर पर आगमन हुआ था ।तब उन्होंने आश्रम को देखकर कहा था कि जो लोग बिना किसी लोभ लालच के अपनी कर्म साधना मे लगे हुए हैं उनकी तपस्या एवं साधना से यह देश समाज बचा हुआ है। श्री कात्रे गुरुजी भी ऐसे ही थे। महापुरुष जिस स्थान पर कर्म साधना करने लगते हैं वह स्थान ही तीर्थ बन जाता है।

सुनील किरवई जागृति मंडल रायपुर द्वारा “परमानंद माधवंम” नाम से एक पुस्तक प्रकाशित की गई है जिसमें स्व सदाशिव कात्रे जी की जन्म से लेकर मृत्यु तक संपूर्ण जीवनी लिखी गई है इसी पुस्तक मे अंग्रेजी मे एक कविता की कुछ पंक्तियों का अनुवाद इस तरह किया गया है कि
बंधु तुम पुस्तक को नहीं ,
मुझे स्पर्श कर रहे हो।
तुम्हारे हाथों पुस्तक नहीं ,
मेरी काया है।
इन पृष्ठों से प्रगट होकर ,
मैं तुम्हारी बांहों मे समा जाऊंगा।

इसी “परमानंद माधवम्”पुस्तक मे लेखक ने विनम्रता के साथ लिखा है कि यह पुस्तक कात्रे जी की संपूर्ण जीवनी नहीं है। उनके व्यक्तित्व का स्पर्श मात्र है । कात्रे जी को समझना है तो उनके कर्म क्षेत्र का प्रत्यक्ष दर्शन करना होगा। लेखक के इस सत्य विचार को मैनें स्वयं महसूस किया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अनुशांगिक संगठन विद्यार्थी परिषद तथा भारतीय जनता पार्टी से जुड़े होने के कारण मुझे विशेष अवसरों पर आश्रम मे आने जाने का अवसर प्राप्त होते रहता है। खैर…

कात्रे जी ने भारतीय कुष्ठ निवारक संघ की स्थापना के लिए सर संघ चालक माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर “गुरुजी” को पत्र लिख कर मार्गदर्शन मांगा था । तब उन्होंने छत्तीसगढ़ के प्रबुद्ध लोगों से चर्चा करके मध्यप्रदेश सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1959 कंडिका 6 (1)1960 के अंतर्गत भारतीय कुष्ठ निवारक संघ चांपा के नाम से दिनांक 5 मई 1962 को विधिवत संस्था का पंजीयन कराया। जिसमें संस्थापक सदस्य जमुना प्रसाद वकील बिलासपुर “अध्यक्ष” , सदाशिव गोविंद कात्रे चांपा “सचिव” ,  बजरंग मुरारका बिलासपुर , डा टीएम दाबके रायपुर , पंढरी राव कृदत्त धमतरी , बालाजी तुलस्यान गोरखपुर उत्तर प्रदेश , डा गोदावरी शर्मा चांपा तथा चांपा के रहने वाले जीवन लाल साव सदस्य थे।

अपने पचपनवे वर्ष की आयु मे भारतीय कुष्ठ निवारक संघ की स्थापना करने वाले कात्रे जी ने समर्पण निष्ठा परिश्रम और साधना के बल पर भारतीय कुष्ठ निवारक संघ का जो बीजारोपण किया था वह धीरे धीरे फलने फूलने लगा था और कात्रे जी वृद्धावस्था मे पहूंच रहे थे। कात्रे जी को यह चिंता थी की उनके बाद इस आश्रम को कौन संभालेगा । ऐसे चिंता की घड़ी मे 1972 में बापट जी जैसे स्वयं सेवक कात्रे जी के संपर्क मे आए और हमेशा के लिए आश्रम मे सेवा के लिए लग गए।

दामोदर गणेश बापट जी अपने परिश्रम समर्पण सेवा निष्ठा त्याग स्नेह एवं आत्मीयता की भाव से भारतीय कुष्ठ निवारक संघ को संवारने मे लग गए। बापट जी की देख रेख मे आश्रम अपने उद्देश्यों की ओर बढ़ रहा था। इसी बीच 16 मई 1977 को कात्रे जी का निधन हो गया । उस समय बापट जी आश्रम मे नहीं थे। गिने चुने लोग थे जिन्होंने आश्रम परिसर मे ही कात्रे जी का अंतिम संस्कार कर दिया । पंडित शंकर पाठक के मार्गदर्शन मे श्री बसंत राव कुलकर्णी ने मुखाग्नि दी।

कात्रे जी के निधन पश्चात बापट जी ने पूरी निष्ठा लगन और परिश्रम से आश्रम के कार्यो को आगे बढ़ाया। आश्रम परिसर मे ही कात्रे जी की आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई। समाधी स्थल बनाया गया तथा माधव सागर के नाम से तालाब का निर्माण भी कराया गया है। वर्तमान मे बापट जी भी गोलोक गमन कर चुके हैं। उनके मार्गदर्शन मे विगत बारह वर्षो से सुधीर देव जी आश्रम के समस्त कार्यों को संचालित करने मे लगे हुए हैं।

भारतीय कुष्ठ निवारक संघ के संचालित कार्यों को देखकर यदि इसे “सेवा का तीर्थ स्थली कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । पुष्प की सुगंध क्षणिक प्रसन्नता दायी होती है और सेवा का सुगंध दीर्घकालिक और प्रेरणादायी होता है । यही कारण है कि मुंबई ,कलकत्ता, दिल्ली, इंदौर , रायपुर , हरिद्वार , भोपाल,  कोल्हापुर, नागपुर,  कानपुर,  डोबिंवली तथा रत्नागिरी आदि नगरों से संचालित प्रतिष्ठित समाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा भारतीय कुष्ठ निवारक संघ को पुरुस्कार तथा सम्मान प्रदान किया गया है।  तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी के द्वारा 22 अक्टूबर 1996 को मेरठ मे संस्था के सचिव श्री दामोदर गणेश बापट जी का सम्मान शाल एवं श्रीफल से किया गया था।

कात्रे जी की जीवटता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि उन्होंने कुष्ठ कल्याण हेतु भारतीय कुष्ठ निवारक संघ के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति श्री राधा कृष्णन से एक हजार रुपये का अनुदान 14 मार्च 1963 को प्राप्त किया । महत्व राशि का नहीं था महत्व कात्रे जी की कार्य कुशलता लगन कष्ट साध्यता परिश्रम शीलता एवं कुष्ठ रोगियों के प्रति संवेदनशीलता का जीता जागता प्रमाण है । फल स्वरुप ग्राम लखुर्री के श्री साध राम साव से लगभग दो एकड़ जमीन प्राप्त कर कुष्ठ आश्रम का कार्य प्रारंभ किया जो विस्तारित होकर आज लगभग 85 एकड़ क्षेत्र मे सेवा कार्य संचालित हो रहा है।

कात्रे जी के जीवन चरित्र को पढ़ने बापट जी के चारित्रिक गुणों का दर्शन करने तथा वट वृक्ष की तरह फैलता जा रहा आश्रम के कार्यों को देखकर मुझे किसी लेखक की पंक्ति याद आ रही है कि….

यूंही नहीं झरते ख्वाहिशों के फूल ,
कर्म के साख को हिलाना होगा।
कुछ नहीं होगा अंधेरों कै कोसने से ,
अपने हिस्से का दिया खुद को जलाना होगा।।

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